नवा अनुच्छेद – शांति से क्रांति

नवा अनुच्छेद – शांति से क्रांति

मैं कुछ करता हूँ , फिर जो किया है ,या तो उस पर खुश होता हूँ, या दुखी , या शर्म आती है , या डर लगता है , या गर्व होता है , अलग अलग विचार मे , अलग अलग स्थिति मे , जो भी मैं करता हूँ उसका अलग अलग प्रभाव पड़ता है ! क्या ऐसा हो सकता है की मैं जो भी करू वह सही हो , और वो मुझे और आस पास सब को खुश रखे ! हाँ , ऐसा बिल्कुल हो सकता है , थोड़ी समझ , थोड़े प्रयास से यह संभव है !

अगर रसोई मे आप दूध गर्म कर रहे हों , और उसे देखते देखते वो उबाल ले ले , पूरा बाहर फैल जाए ! तो आप माँ की मार से बचने का सोचेगे या यह की जल्दबाज़ी मे अनदेखा करने से सब गड़बड़ हो जाता है ऐसा ?  किसी भी घटना से किस प्रकार की समझ बनानी है , यह हमारे दिमाग़ मे चल रहे खेल पर निर्भर करता है ! उस खेल के असली खिलाड़ी आप नही होते … आप पर किसी और का राज़ है , किसका यह आप को खुद समझना है !

दिमाग़ खराब मत करो !! ऐसा हम सब कभी ना कभी किसी से कहते है ! अरे भाई विचार ,स्थिति, मंशा , खराब हो सकती है , दिमाग़ खराब नही हो सकता ! दिमाग़ का खेल निराला है,  शरीर संरचना मे दिमाग़ सबसे महत्वपूर्ण रोल अदा करता है !

हम आँख से नही देखते , दिमाग़ से देखते हैं ! आँख तो सिर्फ़ एक ज़रिया है , उसका कोई दोष नही ! जैसी दिमाग़ मे हम धारणा बना लेंगे , उसी तरह के ही हमारे कर्म , हमारे उत्तर होंगे ! कोई अलग से department अंदर नही बेठा, जो कभी कुछ तो कभी कभी, कहने को मजबूर करता है !

एक विज्ञानिक आँकड़ा बताता है , जब हम किसी भी चीज़ को देखते है , तो हमारा दिमाग़ एक सेकेंड मे 500MB , की रफ़्तार से सूचना की रेकॉर्डिंग करता है , पर हमे सिर्फ़ 250 byte का ही ज्ञान या जागरूकता रहती है ! अगर उस समय को हम, दोबारा याद करे तो सिर्फ़ वातावरण, शरीर , या काल की सूचना, उस 250 byte का लगभग 98% होती है ! यह सिर्फ़ आपके जीवन के एक सेकेंड की बात है ! वातावरण, शरीर , या काल इसलिए क्यूँ की जिस झलाम झाले का जीवन हम जी रहे हैं , उस मे इन तीन विषय के आगे हम खुद बड़ना नही चाहते ! जो surface level पर होता है , वही तो सामने आएगा !

हर एक सेकेंड मे जो भी सूचना हम एकत्रित कर रहे हैं , उसका 1% भी पूरा नही जी रहे ! अरे हम तो सच मे सो रहे हैं !

सच तो हमारे अंदर बिखरा पड़ा है , परंतु हम ही उस तक पहुँचने का प्रयास नही कर रहे ! हम खुद ही इतना सुस्त , डरा हुआ जीवन जी रहे हैं , की जो भी जानकारी हमारे खुद के अंदर है , हम उसे इस्तेमाल नही कर रहे !

उधारण देता हूँ , दिमाग़ एक कंप्यूटर है , जिसकी अनंत GB की hard disk है! जैसी धारणा हम बना लेते है , या किसी भी स्थिति को हम जिस भी angel से देखना चाहते है , दिमाग़ अंदर से वैसा ही printout दे देता है ! ऐसे मे सच , असल सच , पूर्ण सच तो अंदर सोता रहता है , हम अपना काम निकाल कर , चाट पकोडे खा कर आगे निकल जाते है ! खुद को यह आभास भी दिला देते हैं की , वाह!! मुझे गर्व है खुद पर !! अरे हम अपने गुप्त अंगो का इस्तेमाल तो उसे करने दे रहे हैं , पर दिमाग़ को अपना काम नही करने दे रहे !

सिर्फ़ दो ऐसे इलाक़े हैं , जिस का राज़ दिमाग़ पर चलने देते हैं , एक अपनी धारणा , दूसरा आलोचना ! इसी का मिक्स जूस हम है , अगर कोई भी पूछता है , अलग अलग जगह, अलग अलग स्थिति मे की ,  भाई आप कौन हो ? तो जो उत्तर हम देते हैं वो इसी मिक्स जूस से निकलता है ! जो की झूठा है ! धारणा एवम् आलोचना बस दो रस है , दिमाग़ मे अनंत रस है !

दिमाग़ संभावना का भंडार है ! हम ने खुद को सीमित कर रखा है ! जानवर ख़ाता है और सारा दिन घूमता है , मस्त मज़ा लेता रहता है , हमे भी दिन मे दस बार चिढ़ता है , और हम चिढ़ते भी है ! हम मशीन की तरह लगे है , पता नही अपना या किस का जीवन सवार रहे हैं , अपना तो बिल्कुल नही ! और जो जीवन जी रहे है , वो तो जानवर से भी बत्तर है , पैसा चाहे नही है या करोड़ो है !

वाल्मीकि , वेद व्यास , गौतम बुद्ध , विवेकानंद जैसे महारथी जनो ने दिमाग़ की इसी शक्ति हो समझा और सारी दुनिया को इसी शक्ति को समझाने का प्रयास किया ! ताकि सब के जीवन मे क्रांति आ सके ! काल बीतते बीतते इस ज्ञान को तो हम ने अनदेखा किया है, फिर भी धर्म हमारी सोच का आधार रही ! धर्म का आधार वो सूचना प्रदान करना है , जिस से हम अपना , अपने समाज अपने वर्तमान का भला कर सके ! शायद हम ऐसा बिल्कुल नही कर रहे ! करते तो ना हमारा यह हाल होता , ना ही समाज मे त्राहि त्राहि ..

आशा है , आप हर पहलू की गहराई मे जाएगे , आप के जीवन मे क्रांति होगी , क्रांति प्रयास के आती है , प्रयास शांति से करना पड़ता है ! प्रयास करे …

निमंत्रण है आपको शांति से क्रांति के पथ पर ….

@राहुल योगी देवेश्वर

About shantisekranti

Writer , Poet , Thinker and Researcher on Life . I say what I feel , I do not feel the way you feels. Nature never creates replica of BEINGS. We all are born to fulfill certain purpose of Nature, their are many pass by sleeping yet living, some hunts the purpose and few unwanted and unacceptable BINGOSss! The major portion of my expressions are through Poem and Articles ..www.Fitkari.in ( Alum ) is the place where me and my poetry coincides. I am not in this world to bring any revolution. I am here as nature decided me to be here ...like right now I am exactly and full fledged here ( while typing ) ... :)
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