सातवा अनुच्छेद – शांति से क्रांति

सातवा अनुच्छेद – शांति से क्रांति

ट्रेन मे , बस मे या किसी भी सार्वजनिक जगह पर , रोज़ अनजान लोग बिना कारण एक दूसरे से भिड़ते नज़र आ जाते है ! क्या अक्सर घर मे हम नही सुनते की किसी ने कुछ कहा और मैने उसको ऐसा सुनाया की उसकी नानी याद दिला दी ! घर मे भी छोटी छोटी बात पर खिज और झगड़ा ! भाई से , बेहन से , माँ से, पिता से, दोस्त से , साथ काम करने वालो से किसी ना किसी कारण झगड़ा होता ही रहता है ! यह सब रोज़मर्रा का हिस्सा है !

अक्सर माँ ने घर मे वो नही बनाया जो आप ने सोचा था तो झगड़ा , दोस्त ने किसी के सामने आप को कुछ कह दिया तो झगड़ा , बीवी अपने दोस्तो के साथ पार्टी से लेट हुए तो झगड़ा , पति घर मे पंद्रा मिनिट लेट आया तो झगड़ा ! कारण अलग हो सकते है , पर झगड़ा रोज़ होता है ! जब झगड़ा करते हैं तो यही विवेक होता है की ग़लती सामने वाले ही है , हाँ ,सार्वजनिक स्थान पर हुए झगड़े मे किसी और की भूमिका हो सकती है , परंतु उसके झगड़े मे अपना सहयोग दे कर हम स्थिति को शांत नही कर रहे होते , ना ही उसे डरा रहे होते है , बल्कि अपने अहम् ईगो को चॉकलेट खिला रहे होते हैं !

आज कल के जीवन मे टी वी , इंटेनेट , होर्डिंग्स और पार्टीस के ज़रिए नई नई चीज़ो को देखने का मौका मिलता है ! बाज़ार का युग है , बेचने वाले बाय्ल्ड आलू पर कुछ जादू करते हैं , हमे पनीर कह कर फोटो दिखाते है , दाम भी पूरा लेते है , और हम चाव से खाते भी है , कोई कारण हो ना हो दस दोस्तो को मोबाइल बजा कर कहते हैं , फलानी जगह बेठा हूँ , बस यू ही सोचा बड़े दिन हो गये हैं कुछ आउटिंग की जाए ! ला पट्रेडो ऑर्डर किया है , बहुत अच्छा होता है , कई बार खाया है , सुना है , युरोप से रोज़ स्पेशल पनीर फ्लाइट से आता है ! बस खुद से बात करे और सोचे की आप ऐसा करते है या नही ?

बाज़ार का अर्थ बेचो और चेपो दोनो होता है ! विवेक हमारा है ! पर कही ना कही खुद डिसिशन्स नही ले रहे ! उधाहरण के तौर पर आप नया मोबाइल लेते हैं , ऑफीस जा कर सब को दिखाते हैं , कुछ लोग खुश होते हैं , कुछ को जलन होती है ! दो हफ्ते बाद वही कंपनी वही मॉडल कोई और लेता है , और नये फीचर्स के साथ , ऑफीस आता है , सब को दिखता है ! जिस फोन के साथ आप दो हफ्ते से खुश थे वही आपकी निराशा का कारण बन जाता है , यह बस उधाहरण है !

गुस्सा उस पेड़ के फल हैं , जिसे आप जाने कब से बीजे हुए हैं ! किसी एक चीज़ या छोटी छोटी चीज़ो का जुनून , धुन इश्क इसका बीज है , जिसे आप इच्छा , ख़वाहिश या हसरत के पानी से सिंचते रहते हैं ! लोगो से हसरत जाहिर करते हैं , उस चीज़ , भाव या व्यक्ति विशेष को पा लेने का खवाब देखते रहते है ! किन्ही वजहाओ से वो पूरी नही हो रहा होता या नही हो सकता, धुन सवार रहती है !

किसी भी  स्थिति मे गुस्सा शरीर मे प्रवेश नही करता या कर सकता है ! गुस्से का घर हमारा आभा मंडल ( .)  होता है ! जैसे ही कोई ऐसी स्थिति आती है , या दिन आता है , जब महसूस होता है की इच्छा पूरी नही हो सकती , गुस्सा आभा मंडल पर राज़ कर लेता है ! ऐसे स्थिति मे आप कौन सा कदम उठा लेंगे यह तो कोई . भी नही बता सकता !

इतने ज़रूरी काम करने हैं जीवन मे , खुद खुश रहना है , अपने आस पास को खुश करना है ! सब कहते हैं , टाइम नही है टाइम नही है, देखो किन चक्करो मे टाइम बर्बाद किया जा रहा है ! बात को समझ कर , उसकी जड़ को पहचान कर भी अनसुना किया तो कैसा विवेक होगा ! यह बात कहने मे कोई . नही की , खुश रहना ही सभी की सब से पहली आशा होती है , तो खुश रहना शुरू कीजिए , आप को खुद करना है ! धीरे धीरे प्रयास करे , जब भी बीज बोने की स्थिति आए , उसे उखाड़ दे , जब भी इच्छा हावी होने लगे उस पर तगड़े पहलवान की तरहा धोबी पछाड़ लगा दे !

आप किसी पर चिल्ला रहे हो , या कोई चिल्ला रहा हो , आप किसी पर गुस्सा हो रहे हो या कोई किसी पर गुस्सा हो रहा हो तो समझ ले की , आपकी या उसकी कोई इच्छा है , जो पूरी नही हो रही ! इच्छा जिसकी है उस पर ही उस इच्छा का . .  है , उसे अपने विवेक से खुद ही कुछ करना है , किसी पर फूट नही पड़ना !

मैने खुद अपने विवेक से अपनी कई . पर विजय पाई है , और एक एक कर के आगे बडता जा रहा हूँ ! परिणाम क्रांतिकारी हैं , बड़ी ही शांति से अपनी बात कहने की कोशिश की है , शायद आपके जीवन की क्रांति मे भागीदार हो ! बस प्रयास करे …

निमंत्रण है आपको शांति से क्रांति के पथ पर ..

@राहुल योगी देवेश्वर .

About shantisekranti

Writer , Poet , Thinker and Researcher on Life . I say what I feel , I do not feel the way you feels. Nature never creates replica of BEINGS. We all are born to fulfill certain purpose of Nature, their are many pass by sleeping yet living, some hunts the purpose and few unwanted and unacceptable BINGOSss! The major portion of my expressions are through Poem and Articles ..www.Fitkari.in ( Alum ) is the place where me and my poetry coincides. I am not in this world to bring any revolution. I am here as nature decided me to be here ...like right now I am exactly and full fledged here ( while typing ) ... :)
This entry was posted in Peace, Revolution and tagged , , , , , , , , , , , , . Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s