उस पार भी कुछ है -आओ दिखा दूं …

उस पार भी कुछ है … आओ दिखा दूं …

बहुत तरह की गर्द है , जिससे इंसान ने समझौता कर लिया है ! वो कहता है चलना मुश्किल हो गया है , दलदल मे चलना मुश्किल ही होता है , इसमे कोई चोकने की बात नही ! दलदल मे पनप रहे कई कीटाणु अंदर चले गये हैं ! जीतने कदम आगे बढ़ते है उतना ही अंदर की ओर धस्ता जा रहा है इंसान…

कोई उसे हाथ पकड़ इस दलदल मे नही लाया , जाने कौन सा छलावा दिख रहा था उसे दूर बैठे बैठे ,खुद ही खिचा चला आया ! दलदल मे रहता है , घूमता है , बोलता है सोता जागता है , अगर कोई पूछ ले तो साफ इनकार कर देता है कहता है क्या सुंदर बाग है, जैसा सुख यहा मिल रहा है ऐसा कहीं और नही ! कई बार वो साफ रस्तो पर चलते राहगीरो को भी दलदल मे खींच लेता है , लोभ के मारे धँस जाते है उसी के साथ ….

जानता भी है की कुछ भी उठा कर चलना मुश्किल है , फिर भी सर पर ,अपनी बगलो मे और हाथो मे गठरियाँ उठा रखी है , रास्ते मे नया सामान खरीदता रहता है , जाने क्यूँ महरूम रहना चाहता है हल्के-हल्के चलने को … यही सामान उसका ध्यान बँटता रहता है हरपल , अपनी सुध भूल चुका है , जाने क्या करेगा उन कपड़ो का जो पुराने हो चुके , जो अब पहने भी नही जा सकते , पर उन्हे ढो रहा है खुश हो जाता है उन्हे देख कभी कभी ….

दलदल से निकालने के लिए उसे त्याग देना होगा सब कुछ… चाहे एक साथ , चाहे तो एक एक करके … हल्के करना होगा तब तक जब तक रूई सा ना हो जाए … जिस दिन रूई बन जाए , मीठी मंद हवा उड़ा ले जाएगी दलदल के पार … सफ़र आसान होगा , बस खुश्बू होगी …. बस तैरना होगा सुहानी हवाओं मे ….

जीवन दलदल , कीटाणु ,बोझ और बदबू से परे है … बहुत परे …. आओ दिखा दूं ..ले चलूं ….

@राहुल योगी देवेश्वर

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वर्तमान की कला का अनाड़ी – है इंसान …

वर्तमान की कला का अनाड़ी – है इंसान …

विचार तो बारिश की तरह बरसते रहते है , उनको रोक लेना एक अभ्यास या विषय है ! मन बहुत से खेल खिलाता है !

ध्यान देने से पता लगता है की मन , हर वक़्त इसी बात मे उलझा रहता है की अगर कोई ( जिसके बारे मे विचार आ रहे है) मिलेगा तो वो मुझ से सवाल करेगा ! चतुर मन खुद की खूब सारे सवाल बनाता रहता है ! एक एक करके हर सवाल का जवाब तैयार करता है , अपनी मनोस्थिति के अनुसार सब से अच्छे जवाब को चुन कर अलग से रख लेता है ! ऐसी स्थिति मे कुछ पल खूब आनंद मे निकल जाते है ! अब मन इंतज़ार करता रहता है की आमना-सामना हो !

मन को स्वीकृति- अस्वीकृति का खेल खूब भाता है ! अपने लिए खुद ही नई नई स्थितियाँ गड़ता रहता है , हर स्थिति के लिए खुद को तैयार करता है ! यह सब वो स्थितियाँ होती है , जिन मे शायद वो कभी नही पहुँचेगा ! परंतु उस स्थिति मे वो क्या करेगा , दोस्तो , घर वालो और मित्रो से उसके कैसे संबंध रहेंगे हर एक चीज़े पर मन अनेको अनेक बार विचार करता है ,विश्लेषण करता है ! इन विश्लेषानो का प्रभाव उसके वर्तमान मे पड़ने लगता है ! वो कई लोगो के साथ इस प्रकार से पेश आता है जैसे वो सोचता है की कुछ पा लेने की या कुछ बन जाने की स्थिति मे करेगा !

इसी खिचड़ी मे उलझे रहने मे उसे आनंद आता है ! यही स्थिति उसके वर्तमान को नर्क और भविष्या को सुखद सपना बना कर रखती है ! नर्क वर्तमान और भविष्या को सुखद सपना… इस फ़ासले को वो कभी कम नही कर पाता ! और एक दिन शरीर त्याग देता है !

आज जो भी स्थिति है , वो भूत से वर्तमान तक ढोये हुए विचारो ,ख़यालो और सपनो का भोझ है ! उसे उतार फैंक देने मे तो एक ही पल लगता है ! परंतु हर दिमाग़ खेल खेलता रहता है की मैं अगर इस को उतार फैंक दूँगा तो मेरा क्या वजूद होगा , क्या मुझे नया वजूद बनाना होगा या पुराने वजूद का कुछ हिस्सा मेरे साथ रहेगा .. इन्ही बेतुके सवालो मे उसका रूपांतरण फिर कहीं अंधेरो मे खो जाता है !

खुद को जंजीरो मे जकड , ताला लगा , चाबी खो बैठा है इंसान …. जंजीरो को काटने या आग मे तपा देने का साहस नही जुटा पाता….

@राहुल योगी देवेश्वर

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किसी विश्व कल्याण को मेरी ज़रूरत नही …

किसी विश्व कल्याण को मेरी ज़रूरत नही …

भ्रम का आधार पक्का हो जाए तो उसे ज्ञान की संज्ञा नही दी जा सकती ! हार स्वीकार कर लेना तो ज्ञानी का स्वाभाव होना चाहिया परंतु हार का सही सही विश्लेषण कर पाने का अभ्यास भी होना चाहिया ! ग़लत विश्लेषण को आधार, स्वीकार कर लेना भी भ्रम है !

अकेले आना और अकेले जाना प्रकृति का नियम है ! प्रेम प्रकृति का नियम नही प्रकृति का स्वाभाव है ! नियम और स्वाभाव का रास्ता तो एक हो सकता है परंतु वो एक साथ नही चलते ! अकेले आना एक स्वाभाविक नियम है , परंतु अकेले आने मे माता और पिता की प्राकृतिक भूमिका होती है !

लंबे रास्तो पर पड़ाव बने है , पड़ाव मे रुक जाना , कुछ पल के लिए ठहर जाना कोई प्रकृति के नियम का उलंघन नही ! अपने कदम खुद उठाने पड़ते है यह स्वाभाविक है , परंतु अकेले जाने की आने -जाने की परिभाषा को अपने हिसाब से जड़ लेना बस एक जड़ता ही हो सकती है !

बंधन का स्वरूप क्या है , बंधन वो जड़ता है जिस मे अपने लिए कठोर नियम बना उन का पालन करना हो ! प्रकृति के नियमो को ग़लत स्वरूप मे समझना और अपने भ्रम को सत्य मान लेना सबसे बड़ा बंधन है !

जीवन एक प्रकाश है जिसे नयी रोशिनी के लिए सदा खुला रखना चाहिया ! मेरे द्वारा जड़ा गया कोई एक ग़लत नियम अगर किसी एक पर भी ग़लत प्रभाव डालता है तो मुझे प्रकृति के आदेश के लिए सदा तैयार रहना चाहिए !

@राहुल योगी देवेश्वर

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क्या मज़ाक है !!!

क्या मज़ाक है !!!

जीवन किसी रहस्या से भरा नही ! कोई ऐसा नही , जो कुछ पा लेने की दौड़ मे शामिल ना ही ! पा लेने की परिभाषा अलग अलग ज़रूर हो सकती है , उसे तोड़ा मरोड़ा जा सकता है ! उसे शब्दो के जाल से अनेको स्वरूपो मे ढाला जा सकता है !

सपने जो जंगल मे टहलते है , घोड़े की तरहा है , इधर उधर भागते रहते है , भूख लगने पर हरी हरी नर्म घास चरते , प्यास भुजहाने को पोखर तलाशते ! मन चंचल हो उठे तो नये मैदान ढूँडने निकल पड़ते ! सपने मे जीते , सपनो को सर्वोपरि रख उस से बाहर निकल पाने की हिम्मत ना जुटा पाते !

ख़याल धूप छाव के माफिक , छण भर मे बदल जाता है, बस इक ख़याल ही है जिसका कोई वंश नही , कोई ठिकाना नही , जाने किस श्राप मे जीवन काट रहा हो ! पल मे अपना दोस्त पल मे दुश्मन बन जाता है ! कभी स्वचंद आकाश मे उड़ाता है तो कभी गहरे पानी मे डुबकी लगवाता है ! कपटी कह कर भी क्या तस्सली दू खुद को , इस मे भी उसे का रूप बसा है !

विचार किसी शिक्षित और गुणी से बसे रहते है , कुछ यू कुनबा बसा लिया है की अब कहीं और का रुख़ नही होगा ! चाय की चुस्कियों के बीच तर्क करते रहते है ! विचारो ने खुद को महान घोषित कर रखा है ! स्वप्न और ख़याल का इस दुनिया मे घुस पाना मुश्किल है ! जाने अंजाने अपना स्वाभाव भी बदल लेते है ! सादे कपड़ो मे लिपटे विचार किसी और से सुंदर नही , पर हाँ छल से राज़ ज़रूर चला रहे हैं !

माँस , खून , नाडी और हड्डियों के बीच गर्द और दलदल फसी बैठी है ! जाने कौन , किस दाम मे चमड़ी का व्यापार करता है ! किस को कौन का रंग देता है इसका पैमाना कैसे तय करता है ! बाज़ार मे घूमते जो तन सुंदर दिखते है , मुर्दाघरो मे उन्ही से बदबू आती है ! जाने क्यूँ खिल उठा है मेरा चेहरा , जाने क्यूँ हँसी आ रही है मुझे …

@राहुल योगी देवेश्वर

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तलाश आ बैठी है मेरे जीवन मे

तलाश आ बैठी है मेरे जीवन मे

कुछ धारणए सज सवर बैठ जाती है ! समय जो निरंतर है , चलता रहता है, सतह पर बदलाव होते रहते है ! मूल सतह कहीं गहराइयो मे बसी होती है , वह अपना रंग बदलती है , रूप मे समय के साथ तीखापन झलकना शुरू हो जाता है परंतु उसका मूल स्वरूप वही रहता है , जो जड़ा बैठा है बचपन से सजोए सपनो मे … !

उधारण के रूप मे , जो कोई दुनिया मे नाम कामना चाहता है , वो कई हथकंडो से गुज़रता है ! हार मदहोश करती जाती है ! अपने आस पास सब विरोधाभाषी लगने लगता है ! मदहोशी मे उठे कदम सही ही लगते है, गिर पड़ने की स्थिति मे खुद को शिकार और आस पास को विरोधी समझने लगता है ! रास्ते तो कई होते है आगे बढ़ने को , परंतु मूल सतह पर बसा स्वरूप पीछा नही छोड़ता , रास्ता वही चुना जाता है जो कदम दर कदम खुद से दूर ले जा रहा है !

साफ देखना हो तो खुद के आनंद झाँक कर देखने से तस्वीर उभर कर आती है ! अपना भला ना कर पाने वाला इंसान कैसे खुद को मसीहा समझने लगता है ! जीवन की बहती धारा को झुठलाने लगता है ! कुछ चंद भटको को पुराने अंधेरो से निकाल नये अंधेरो की तरफ़ धकेल देता है ! भटको को नई जगह पसंद आती है , नई जो होती है , पुराने अंधेरो से दूर …

जीवन काल नही कला नही , कला किसी भी निर्देश से बँधी नही होती ! यहाँ मूल का ज्ञान रखने वाले भी जब अपने खुद के निर्देशो की सूची बना लेते है , उसे ही दिव्य भाव समझ सब पर उसे ही थोपने का प्रयास करते है ! दिव्य भाव भी एक कला है , जिसका राग , रंग , रूप और मूल एक सा नही !

बेल पत्र पर लिखने शुरू करने से पहले इंसान पठारो , पहाड़ो और पथरो पर लिखता था, बाद मे काग़ज़ पर लिखने लगा , आज वही इंसान कंप्यूटर पर लिखता है ! लिखना जो मूल है वो हो रहा है सदियो से साधन समय के अनुसार बदल रहे है ! जीवन भी ऐसा ही है , ना की किसी मसीहा के निर्देशो से बँधा …

स्वपन टूटते रहते है , सतह पर बदलाव दिखते रहते है , मूल स्वरूप वही रहता है ! जो कोई भी जो कुछ भी बनना चाह रहा है वो उसी दौड़ मे लगा है ! मैं बाहर बैठा देखता हूँ कोई तो मिले जिसके जीवन मे सपना ना हो …. ना माँगते हुए भी तलाश आ बैठी है मेरे जीवन मे …. आ जाओ दोस्त स्वागत करता हूँ …

@राहुल योगी देवेश्वर

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नवा अनुच्छेद – शांति से क्रांति

नवा अनुच्छेद – शांति से क्रांति

मैं कुछ करता हूँ , फिर जो किया है ,या तो उस पर खुश होता हूँ, या दुखी , या शर्म आती है , या डर लगता है , या गर्व होता है , अलग अलग विचार मे , अलग अलग स्थिति मे , जो भी मैं करता हूँ उसका अलग अलग प्रभाव पड़ता है ! क्या ऐसा हो सकता है की मैं जो भी करू वह सही हो , और वो मुझे और आस पास सब को खुश रखे ! हाँ , ऐसा बिल्कुल हो सकता है , थोड़ी समझ , थोड़े प्रयास से यह संभव है !

अगर रसोई मे आप दूध गर्म कर रहे हों , और उसे देखते देखते वो उबाल ले ले , पूरा बाहर फैल जाए ! तो आप माँ की मार से बचने का सोचेगे या यह की जल्दबाज़ी मे अनदेखा करने से सब गड़बड़ हो जाता है ऐसा ?  किसी भी घटना से किस प्रकार की समझ बनानी है , यह हमारे दिमाग़ मे चल रहे खेल पर निर्भर करता है ! उस खेल के असली खिलाड़ी आप नही होते … आप पर किसी और का राज़ है , किसका यह आप को खुद समझना है !

दिमाग़ खराब मत करो !! ऐसा हम सब कभी ना कभी किसी से कहते है ! अरे भाई विचार ,स्थिति, मंशा , खराब हो सकती है , दिमाग़ खराब नही हो सकता ! दिमाग़ का खेल निराला है,  शरीर संरचना मे दिमाग़ सबसे महत्वपूर्ण रोल अदा करता है !

हम आँख से नही देखते , दिमाग़ से देखते हैं ! आँख तो सिर्फ़ एक ज़रिया है , उसका कोई दोष नही ! जैसी दिमाग़ मे हम धारणा बना लेंगे , उसी तरह के ही हमारे कर्म , हमारे उत्तर होंगे ! कोई अलग से department अंदर नही बेठा, जो कभी कुछ तो कभी कभी, कहने को मजबूर करता है !

एक विज्ञानिक आँकड़ा बताता है , जब हम किसी भी चीज़ को देखते है , तो हमारा दिमाग़ एक सेकेंड मे 500MB , की रफ़्तार से सूचना की रेकॉर्डिंग करता है , पर हमे सिर्फ़ 250 byte का ही ज्ञान या जागरूकता रहती है ! अगर उस समय को हम, दोबारा याद करे तो सिर्फ़ वातावरण, शरीर , या काल की सूचना, उस 250 byte का लगभग 98% होती है ! यह सिर्फ़ आपके जीवन के एक सेकेंड की बात है ! वातावरण, शरीर , या काल इसलिए क्यूँ की जिस झलाम झाले का जीवन हम जी रहे हैं , उस मे इन तीन विषय के आगे हम खुद बड़ना नही चाहते ! जो surface level पर होता है , वही तो सामने आएगा !

हर एक सेकेंड मे जो भी सूचना हम एकत्रित कर रहे हैं , उसका 1% भी पूरा नही जी रहे ! अरे हम तो सच मे सो रहे हैं !

सच तो हमारे अंदर बिखरा पड़ा है , परंतु हम ही उस तक पहुँचने का प्रयास नही कर रहे ! हम खुद ही इतना सुस्त , डरा हुआ जीवन जी रहे हैं , की जो भी जानकारी हमारे खुद के अंदर है , हम उसे इस्तेमाल नही कर रहे !

उधारण देता हूँ , दिमाग़ एक कंप्यूटर है , जिसकी अनंत GB की hard disk है! जैसी धारणा हम बना लेते है , या किसी भी स्थिति को हम जिस भी angel से देखना चाहते है , दिमाग़ अंदर से वैसा ही printout दे देता है ! ऐसे मे सच , असल सच , पूर्ण सच तो अंदर सोता रहता है , हम अपना काम निकाल कर , चाट पकोडे खा कर आगे निकल जाते है ! खुद को यह आभास भी दिला देते हैं की , वाह!! मुझे गर्व है खुद पर !! अरे हम अपने गुप्त अंगो का इस्तेमाल तो उसे करने दे रहे हैं , पर दिमाग़ को अपना काम नही करने दे रहे !

सिर्फ़ दो ऐसे इलाक़े हैं , जिस का राज़ दिमाग़ पर चलने देते हैं , एक अपनी धारणा , दूसरा आलोचना ! इसी का मिक्स जूस हम है , अगर कोई भी पूछता है , अलग अलग जगह, अलग अलग स्थिति मे की ,  भाई आप कौन हो ? तो जो उत्तर हम देते हैं वो इसी मिक्स जूस से निकलता है ! जो की झूठा है ! धारणा एवम् आलोचना बस दो रस है , दिमाग़ मे अनंत रस है !

दिमाग़ संभावना का भंडार है ! हम ने खुद को सीमित कर रखा है ! जानवर ख़ाता है और सारा दिन घूमता है , मस्त मज़ा लेता रहता है , हमे भी दिन मे दस बार चिढ़ता है , और हम चिढ़ते भी है ! हम मशीन की तरह लगे है , पता नही अपना या किस का जीवन सवार रहे हैं , अपना तो बिल्कुल नही ! और जो जीवन जी रहे है , वो तो जानवर से भी बत्तर है , पैसा चाहे नही है या करोड़ो है !

वाल्मीकि , वेद व्यास , गौतम बुद्ध , विवेकानंद जैसे महारथी जनो ने दिमाग़ की इसी शक्ति हो समझा और सारी दुनिया को इसी शक्ति को समझाने का प्रयास किया ! ताकि सब के जीवन मे क्रांति आ सके ! काल बीतते बीतते इस ज्ञान को तो हम ने अनदेखा किया है, फिर भी धर्म हमारी सोच का आधार रही ! धर्म का आधार वो सूचना प्रदान करना है , जिस से हम अपना , अपने समाज अपने वर्तमान का भला कर सके ! शायद हम ऐसा बिल्कुल नही कर रहे ! करते तो ना हमारा यह हाल होता , ना ही समाज मे त्राहि त्राहि ..

आशा है , आप हर पहलू की गहराई मे जाएगे , आप के जीवन मे क्रांति होगी , क्रांति प्रयास के आती है , प्रयास शांति से करना पड़ता है ! प्रयास करे …

निमंत्रण है आपको शांति से क्रांति के पथ पर ….

@राहुल योगी देवेश्वर

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अठवा अनुच्छेद – शांति से क्रांति

अठवा अनुच्छेद – शांति से क्रांति

ईश्वर से मिलने की चाह का मूल कारण profit without investment होता है , profit का रूप कोई भी हो सकता है ! भक्ति , मनोकामना , जन कल्याण परंतु हर रूप के गर्भ मे फ़ायदा छुपा हुआ है , कोई बुराई नही है उसमे , पर गर्भ को जान लेने मे भी कोई बुराई नही !

किसी साधु से मुलाकात हुई , उसने कहा बोलो क्या चहा है , रास्ता मैं बतलाता हूँ ! अब पैसा छप्पर फाड़ कर मिल रहा हो , तो बटोर लेने मे ही समझदारी है , बस वही हुआ मेरे साथ , राज़ मालूम हुआ की यह मंत्र है , इसका जप करते रहो 12 वर्ष मे लक्ष्मी सिद्ध हो जाएगी फिर जितना मूह फड़ोगे उतना मिल जाएगा ! हर्ष हुआ पर 12 वर्ष सुन कर निराशा भी हुई , आज़माने मे कुछ जा भी नही रहा था , मंत्र वैसे भी मन मे पढ़ना था , अगर बेवकूफ़ बनता तो ब्रेकिंग न्यूज़ भी नही बन रही थी तो बस काम शुरू ! हाँ , साधु को निराशा इस बात की हुई की मेरे जैसा जवान ,सूझवान मानव जो उनका विचार था , परम सुख की कामना कहता ! मुझे तो परम सुख माया मे ही दिखा सो माँग लिया !

गुनगुनाना चलता रहा , जीवन भी बहता रहा ! जब भी मुलाकात होती , तो अपनी फकीरी का status quo बता देता ! कभी कभी अपने आप को साधक समझने मे बड़ा मज़ा भी आता !

साधु शब्द पाली से आया है , जिसका अर्थ सत्य है ! हज़ारो वर्ष पूर्व लोग रोज़मर्रा के जीवन मे अगर कोई सत्य बात कहता तो साधु साधु , कहते थे ! फिर जो लोग सत्य के राह पकड़ लेते उनको साधु कहने लगे ! अंत मे साधु रह गया सत्य गायब हो गया !

मंत्र अंतर्मन को एकाग्र करने के लिए लिखे गये ! हर मंत्र का अर्थ है , साधु काल मे ,  patient अर्थात मरीज़ , मानसिक , शारीरिक या जिज्ञासा से भरा , अगर किसी रोग का शिकार होता तो उसे मंत्र दिया जाता ! कहा जाता जाओ इसको पढ़ते रहो , जिस दिन अर्थ जान जाओ गे तुम्हारा कल्याण हो जाएगा ! अर्थात , उस मंत्र के शब्दार्थ मे उसकी बीमारी का इलाज छुपा होता, पढ़ते पढ़ते एक दिन वो जान जाता की मैं जो ग़लती कर रहा हूँ , उसे ठीक कैसा करना है और उसे वो ग़लती खुद अपने प्रयास से ठीक करनी पड़ती !

एक मूह से दूसरे मूह , दूसरे मूह से तीसरे मूह बात जब निकल जाती है , तो कोई हसीन गुल खिलाती  है ! बस वैसा ही कुछ हमारे मंत्रो के साथ हो रहा है ! दो चार तो आप को भी याद होंगे !

मंत्र एक साधन है जिस को जब आप पढ़ते है , लगातार जप करते रहते हैं , तो किसी फालतू काम मे टाइम वेस्ट नही होता ! बार बार जपने को बस इसी लिए कहा जाता है , क्यूकी बार बार कहने से , बताने वाला की मंशा होती है , भाई एक बार तो ध्यान से अर्थ समझ , और उस अर्थ को जीवन मे उतार , फिर देख क्रांति ही क्रांति !

ध्यान भी एक साधन है , अंतर्मन को समझने के लिए ! The most effective tool , सारा दिन ध्यान ( Meditation )करने से आप कोई ईश्वर नही बन जाने वाले ! हाँ , जिस जिस किताब मे आप ने ईश्वर के बारे मे अच्छी अच्छी बाते पढ़ी है , उन को अपने जीवन मे उतार सकने की शक्ति और समझ ज़रूर जुटा सकते हैं ! परंतु फिर जीवन मे उतारने का प्रयास खुद को ही करना पड़ेगा , Automatic नही होगा ! Automatic तो शब्द भी बाज़ार मे फ्री मे नही मिलता , उसके लिए भी dictionery ख़रीदनी पड़ती है !

ज्ञान , ब्रह्म ज्ञान , सच मे उपलब्ध है , फिर वही प्रयास की ज़रूरत है ! FREE FREE FREE Tag के साथ तो सिर्फ़ धोखा मिलता है , फिर वहाँ भी Donation देनी पड़ती है , पर मन को सब पुचकार लेते हैं की शायद कुछ भला हो जाए !

ध्यान वो दशा है , जहाँ आप अपने विचारो पर विजय पा लेते है ! एक survey बताता है की हम एक दिन मे लगभग 60 हज़ार बार , या 60 हज़ार बाते सोचते हैं ! मन बड़ा ही शैतान है , एक जगह पर रुकता नही ! विचारो मे कोई contiunity भी नही ! सोच सोच कर दिमाग़ पर इतना बोझ डाल देते हैं की सिरदर्द की गोली हमेशा जेब मे रहती है !  जेब गर्म हो तो रोज़ डॉक्टर की किस्मत चमका कर भी आते हैं ! फिर आम dialouge सुनने को मिल जाता है की ” life is full of tensions yaar ” , “मैं बहुत tension मे हूँ मुझे अकेला छोड़ दो ” , ” I need some Space” .

कोई पहाड़ा नही पढ़ना , किसी जंगल मे नही जाना , कोई पर्वत नही चढ़ना , कोई अगरबत्ती नही जलानी ! बस उस state मे पहुँचना है , जहाँ आप इन 60 हज़ार विचारो को एक एक कर अपने दिमाग़ के inbox से delete करते जाए ! धीरे धीरे होगा , पर ज़रूर होगा , यह पक्का है ! अब बचपन मे नानी के घर के पास एक कुत्ता था जिस के बच्चे ने बगल वाली आंटी के घर मे potty कर दी थी , यह भी लोगो के concious mind मे रहता है ! मुझे कोई बता दे की इस विचार से आप के growth मे  कहाँ मदद हो रही है ! delete मरो ना, recycle bin से भी delete  कर दो  ! कैसे होगा , ध्यान से , meditation से , भूल जाने से नही , भूलने से तो फिर किसी दिन यू ही याद आ जाएगा , और आप का जो समय और शक्ति किसी और काम मे लगनी चाहये उसको खा जाएगा ! विचार करे !

जैसे जैसे दिमाग़ मे deletion होता जाए , उसको अच्छी अच्छी मौलिक विचारो से भरते जाइए ! void या null की state भी अच्छी नही , उसे संभालना थोड़ा मुश्किल होता है ! moral values से भरते जाइए , कोई मुश्किल नही होगी !

अब meditation के कई चक्कर हैं , आप किसी चक्कर के चक्कर मे ना पड़े तो आप का चक्कर बाड़िया रहेगा ! एक बार शुरू हो गये , कुछ समझ बड गई फिर सारे चक्कर भी समझ आ जाएँगे !

अब ध्यान के साथ मंत्र पड़ेंगे तो ध्यान तो मंत्र मे रहेगा , फिर ध्यान तो पूर्ण हुआ नही , मंत्र का चक्कर चलता रहा ! ध्यान का बेसिक अर्थ मन को एक जगह एकाग्र करना है , जब कोई विचार ना हो , ऐसी स्थिति मे आप अपने अंतर्मन को महसूस कर पाएगे ! मन मे कोई सवाल आए गा , तो उसका जवाब समझ आ जाएगा, या मिल जाएगा ! कुछ देर बाद उसी एक सवाल के कई जवाब , कई विस्तार (dimensions ) मिलेंगे ! वही स्थिति ब्रह्म ज्ञान है ! तो अगर समझ बढ़ानी है तो शुरू करो !

बात तो आप लोगो के समक्ष रखनी थी , शायद साफ साफ बताया है या कोशिश की है ! हाँ मान लेने पर क्रांति ज़रूर होगी , पर एक एक कदम शांति का है ! फूट फूट कर कदम रखना होगा , चले आओ फिर …

निमंत्रण है शांति से क्रांति के पथ पर …

@राहुल योगी देवेश्वर

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